“भरदुतिया”

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आभा झा।                           

भाई-बहिनक जीवन में भरदुतियाक दिन विशेष महत्व रखैत अछि। भरदुतिया कार्तिक मासक शुक्ल पक्षक द्वितीयाक दिन मनाओल जाइत अछि। भरदुतिया के विभिन्न नाम सं जानल जाइत अछि,जेना- भातृ द्वितीया,यम दूज,भाई दूज,मिथिलांचल में एहि पाबैन के भरदुतिया कहल जाइत छैक। एहि दिन पूरा मिथिलांचल में चहल-पहल रहैत अछि। भोरे सं सब बहिन सब अपन भाई के स्वागत लेल मिठाई आ ओरियान में जुटि जाइत छथि। अरवा चाउर के पइन में फुला कऽ पिठार बनबैत छथि। ओहि पिठार सं आंगन में अरिपन दऽ कऽ ओहि पर माटिक या पितरिया बासन में पइन डालि कऽ ओहि में पानक पात पांच टा,मखान,सुपारी,कुम्हरक फूल,चांदीक सिक्का एवं केराव के पइन में डालैत छथि। अरिपनक बगल में पीढ़ी राखल जाइत छैक ओहि पर सेहो पिठार लगाओल जाइत अछि। भाई ओहि पीढ़ी पर पूब दिस मुख करि कऽ बैसैत छैथ एवं अपन दुनू हाथ के आगू बढ़बैत छैथ। बहिन सब सं पहिने माथ पर पिठार आ सिंदूरक टीका लगबैत छथि। एकर बाद खुजल दुनू हाथ में पिठार,घी,मधु,और सिंदूर लगा कऽ बासन में राखल पान,सुपारी,मखान,कुम्हरक फूल एवं सिक्का आ केराव राखैत छथि फेर ओहि पर बामा हाथ सं जल ढारैत छथि एवं दायां हाथ सं भाईक हथेली सं सब सामग्री के ओहि बासन में ई मंत्र पढ़ैत गंगा नोतई छथि जमुना के,हम नोतई छी अपन भाई के,जहिना गंगा जमुना के धार बाह्य तहिना हमरो भाई दीर्घायु होइथ।
ई प्रक्रिया तीन बेर कैल जाइत अछि। फेर एकर बाद बहिन बासन में सं एक अंकुरी या मिठाई भाई के मुंह में खुआबैत छथि। एकर बाद भाई अपन बहिन के अपन सामर्थ्य अनुसार उपहार दैत छथि। एहि सबहक बाद भाई के भोजन करबै के मिथिलाक परम्परा अछि। अर्थात अरवा चाउरक भात,राहिरिक दालि,आलू,केरा,भांटा,परोरक तरूआ,चारि-पांच तरहक तरकारी,पापड़,अचार संग मिथिलाक प्रसिद्ध तिलकोरक पातक तरूआ अनिवार्य अछि। अंत में दही एवं मिठाई भाई के भोजन में परसल जाइत अछि। बहिन यदि सासुर में रहैत छथि तऽ भाई हुनकर सासुर जा कऽ बहिन सं नोत लैत छैथ। बहिन भाई के बाट तकैत छथि। एहि पाबैनक दिन बहिन अपन भाई के दीर्घायुक लेल भगवान सं प्रार्थना करैत छथि।
धर्म शास्त्रक अनुसार एहि दिन जमुना अपन भाई यमराज के घर बजा कऽ हुनकर आदर सत्कार केने छलीह। अहि सं प्रभावित भऽ कऽ यमराज जमुना के जिनगी भरि सधवा रहै के आशीर्वाद देने छलखिन। अहि कथा सं प्रेरित भऽ कऽ बहिन अपन भाई सं नोत लैत छथि। वस्तुतः अहि पाबैन के मुख्य उद्देश्य अछि भाई-बहिनक मध्य सौमनस्य और सद्भावनाक पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखनाइ तथा एक-दोसरक
प्रति निष्कपट प्रेम के प्रोत्साहित केनाइ अछि।
जय मिथिला जय जानकी ।
आभा झा
गाजियाबाद