“भाइ-बहिनक सबसँ पैघ पाबैन”

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— अखिलेश कुमार मिश्र।                 

मिथिलाक भाय-बहिनक स्नेहक महान त्यौहार भरदुतिया कार्तिक महीनाक शुक्ल पक्षक दुतिया तिथि कs मनाओल जाइत अछि। भरदुतिया दू शब्द “भ्रातृ आ द्वितिय” सँ बनल अछि। भ्रातृ मतलब भाय आ द्वितीय तs दुतिया तिथि भेल। ई तिथि सूर्यक पुत्र यम आ पुत्री यमुना मतलब यम-यमुना भाई बहिनक स्नेहक प्रतीक रूप में मनाओल जाइत अछि। एक्कर पाछाँ कें कथा तs अहि तरहें अछि जे यम (यमराज) कें तs कहियो फुर्सत नै। मुदा यमुना कें इच्छा जे भाई भेंट करs आबैथि। एक दिन (कार्तिक शुक्ल दुतिया) कs अचानक यम अपन बहिनक दुआरि पर सीधे आबि गेलाह। ओना तs दुनियाँ में कियो नै चाहैत अछि जे यम दुआरि पर आबैथि, मुदा यमुना अप्पन भाय कें देखि अति हर्षित भेलीह। भाय कें खूब आदर सत्कार केलीह ताहि सँ यम प्रसन्न भs यमुना के वरदान देबाक वचन देलैथि। तहन यमुना कहलीह जे अहाँ हमरा ओतय साल में कम सँ कम एक बेर जरूर आबी आ अहि तिथि कँ जे बहिन अप्पन भाय कें लेल जे मंगलकामना करैथि तिनकर भाय कें अहाँ अभय दान देबै अर्थात हुनकर अकाल मृत्यु नै होइन्ह। यमराज ई दुनू वचन अप्पन बहिन यमुना कें दs विदा भेलाह। तहिये सँ ई त्यौहार “भरदुतिया” मनाओल जाइत अछि।
तैं एक्कर विशेष मंत्र बहिन अहि तरहें पढै छैथि,
“यमुना नोतै छैथि यम कें, हम नोतै छी भाय कें,
जेना गंगा-यमुना कें आयु अछि, तहिना हमर भाय कें आयु हो।”
अहि दिन तs बहिन सभ भोरे सँ भाय कें नोत लै लेल ओरियान में लागि जाइ छैथि। आँगन कें नीप कँ बीच आँगन में सिन्दूर पिठार सँ अरिपन दs, माटिक मटकुरी में पाँच पानक पात, पाँच कुम्हरक फूल, केराव, मखान, पाँच सौँसे सुपारी आ एक सिक्का एवं गंगाजल युक्त अछिन्जल राखैथि छैथि। भाय कें बैसक लेल पीढ़ी कें सेहो धो पखारि सिन्दूर पिठार सँ सज्जित कड़ैत छैथि। जेखन भाय नोत लेबs आबै छैथि तs बहिन वैह पीढ़ी पर बैसा कs लिलाट पर पिठार सिन्दूर सँ टीका लगबै छैथि। तक्कर बाद भाय के दुनू हाथ जोरि आँजुर में सेहो सिन्दूर पिठार लगबै छैथि आ आंजुर में मटकुरी बाला सभ चीज हाथ में दै छैथि। फेर उपरका मन्त्र पढ़ैत एक हाथ सँ अछिन्जल सँ हाथ कें धो दै छैथि जे सभ किछु मटकुरी में जमा भs जाइत अछि। ई प्रक्रिया तीन या पाँच बेर कैल जाइत अछि। तदुपरांत भाय कें नीक नीक भोजन करैल जाइत अछि। बाद में भाय सँभ यथा शक्ति बहिन कें उपहार दै छैथि आ बहिन कें जिनगी भरि रक्षा करs कें वचन दै छैथि।
पहिले कें समय में जिनका एक दू भाय आ बहिन ज्यादा छल हुनका बड्ड दिक्कत रहैन्ह। बहिन सभ दिन भरि भूखे प्यासे भाय सभक प्रतीक्षा कड़ैथि। आई काल्हि जेकाँ सवारी साधन नै, विशेष रास्ता पैदल ही तय कैल जाइत छल। किनको किनको साइकिल रहैन्ह। सूचनाक तs कुनो साधन नै, तहन कौआ कें कुचरs सँ अनुमान लगबैथि जे भाय एताह। ओ इंतजार आ फेर भाय सँ भेंट, नोत लेनाइ आ फेर भाय कें विदा होइ कें क्षण कें मार्मिकता कें सिर्फ अनुमान कs सकै छी। भाय कें लेल इन्तजारक बीच में साउस-ननदि कें बोल जे “अहाँक भाय तs लबरा छैथि, नै एताह तेताह। खा पी लीय, कते भूखे रहब”। कतेक कचोटैत छल होयत, सोचि सकै छी। आई काल्हि तs मोबाइल, पल पल कें सूचनाक आदान प्रदान, मोटर गाड़ी सेहो तs भाय सभ झट द पहुंच जेताह।
मुदा हमरा हिसाबे वैह समय में त्यौहारक रोचकता बेसी रहै।
अंत में, मिथिलांचल कें कायस्थ समुदाय में अहि दिन दवात पूजा, चित्रगुप्त पूजा कें रूप में सेहो मनाओल जाइत अछि।