“चेतनाक सजीव नाम : राम”

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— भावेश चौधरी।                         

“गुणा, गुणज्ञेषु, गुणा भवंति”- पूजनीय और आदर्श होई लेल व्यक्ति के रूप, जाति,वंश के महत्व नई,अपितु सद्गुण आ सत्कार्य जरूरी। परिवार,समाज,देश आ धर्म के समान रूप सा महत्व दैत,कर्त्तव्यपरायणता पूजनीय। “राम से बड़ा राम का नाम”।”राम” के महत्व के शब्द सीमा में बंधनाई असंभव,तथापि हुनकर गुणवान,धर्मज्ञ,कृतज्ञ, सत्तचरित्र, दृढ़प्रतिज्ञ,सदाचारी,विद्वान,धैर्यवान,दयालु,कुशल नेतृत्व आ आदर्श भ्राता के गुण सा हम विशेष प्रभावित।”राम” नाम मात्र एहन प्रभावकारी जे कुख्यात डाकू रत्नामल के रामायण रचयिता महर्षि बाल्मीकि बना देलकन।”दुनिया में सबहक अप्पन,अप्पन अप्पन सबहक राम” !रामक व्यक्तिगत जीवन लगभग पूरा त्रासदीपूर्ण रहलन।लेकिन सब मुश्किल के शिष्टापूर्वक सामना करैत,मुश्किल समय में अपना के बेहद गरिमापूर्ण रखनाई के गुण राम के पूजनीय बनबैत छैन। स्वयं के भावना आ सुख सा समझौता करैत न्याय आर सत्य के संग दैत,विषम परिस्थिति में नीति सम्मत रहैत, वेद आ मर्यादा के पालन करैत सुखी “रामराज्य” के स्थापना केलैन। आइतक रामराज्य के दोसर पर्यायवाची शब्द नई बनल।पिता के वचन के रक्षा आ माता कैकेयी के आज्ञा मानै हेतु १४ वर्षक वनवास,राजा होईतो जंगल के कष्टप्रद जीवन बितेनाई, अपार शक्तिशाली रहितो समुद्र पर सेतु बनबई लेल तपस्या,विवाहित रहितो संन्यासी जीवन बितेनाई राम के धैर्य आ सहनशीलता के पराकाष्ठा छैनि।न्यायालय में न्यायाधीश पुछलखीन- “रामसेतु सच में है?” जवाब भेटलन- “महोदय,रामसेतु है,और राम से तू है।”वनवास काल में पशु पक्षी, दानव मानव,सबके अपन छत्र छाया में लेने बिना कोनो विवाद के सबके संगे लय के चलनाय हुनकर कुशल नेतृत्व के द्योतक भेलनि। जटायु, सुग्रीव,हनुमान, विभीषण- सब संगे दोस्ती निभेनाई बिना कोनो जाति/रंग/योनि भेद के।लंका विजयी भेल के बाद विभीषण के राज्य के उत्तराधिकारी बनेनाई सत्तचरित्र ,कृतज्ञता आ दयालुता के सर्वोच्च उदाहरण। भ्रातृ प्रेम के ता कोनो तुलना नै।सौतेला रहितो अपन सा बेसी प्रेम,सब लेल त्याग आ समर्पण के भाव राम के अलावा आओर कतऊ नै देखल गेल।शायद शब्द सीमा समाप्ति भा रहल अई। संक्षेप में आदर्श भाई,हनुमान के लेल स्वामी,प्रजा के लेल नीति कुशल व न्यायप्रिय राजा,सुग्रीव आ केवट के परम मित्र आ परिवार के साथ लय के चलय के गुण राम के “भगवान राम” आओर “पुरुषोत्तम राम” के विशेषण सा विशेषित करैत छैन।जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।।जय मिथिला, जय मैथिली।।