“खोंइछ भरबाक धार्मिक महत्व”

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– विवेकी झा।                 

“खोइंछ” ई नाम लैते देरी अपन अर्थक बोध अपने आप निकैल क सामने आबि जाईया। महिलाक सारी के आँचरक ऊट बाला भाग खोइंछ भेल और ओई में आशीर्वाद रुप में जे भरल गेल जे अन्न उएह खोइंछ भरनाय भेल ।

कन्या की विदाई के समय ( नैहर सँ सासुर आ सासुर सँ नैहर आबै के समय) माँ आ सास, भौजी और कोनो पैघ के द्वारा आँचरक खुट में भरल जैत छै ।

“खोइंछ” एकर धार्मिक त पूरा भारत में पर पारम्परिक मुख्यतः उत्तर भारत में खास क यूपी के किछु प्रदेश आ बिहार में एकर बिशेषतया देखल जायत आइछ । अपन मिथलान्चल में एकर अलग महत्व छै बेटी नैहर सँ सासुर जैथ आ सासुर सँ नैहर आबैथ दुनु दिस सँ खोइंछ भरै के परंपरा सिर्फ अहिठाम भेटत ।

नैहर सँ सासुर जैत काल माँ अपन बेटी के आंचर में धन-धान्य सँ भरल रहै तै स्नेहक सँग भावनाक भाव आ प्रेम रूप में ससुराल भेजल जैत छैन । आँचल के गाँठ में ‘खोइंछ’ में 11 मुठ्ठी धान , सँगे-सँग सिन्दूर, सौस हल्दी , दूवी और रुपया देल जायत छै । मोनक भावना ई छै जे हम जे बेटी आहाँ के सौपी रहल छी ओ धाने जका असिद्ध,कोमल ,सूक्ष्म ऐछ, गृहस्थीक जीवन सँ अनभिज्ञ ऐछ ।
ठीक एकर बिपरीत सासुर सँ नैहर जायत काल ‘खोइंछ’ में 11 मुठ्ठी चौर , सँगे-सँग हल्दी, सिन्दूर, दूवी और रुपया देल जायत छै । ई भावनाक संग जे आहाँ जे धान भेजने रहि ओकरा आब हम चौर बना देलौं ।
खोइंछा सदिखन बाँसक सूप में राईख क देल जायत छै, कारण जे बाँस के जईर सँ एक नब बाँस निकलैत छै जे वंश वृद्धिक प्रतिक मानल गेल, हल्दी के गाँठ जेना एक दूसरे सँ जुरल रहैत छै ओहिना ओ अपन परिवार के एक साथ बांध के राखैत , हरीयर दूबि सन परिवार के नवचेतना दैथ, सिन्दूर सँ भाग – सुहाग बनल रहैन, चाँदी आ पाय ताकी लक्ष्मीक बास होयन ।

परन्तु बड अफसोस के बात त ई जे अय कैल के ई फैशनक दौड़ जे चैल परल आइछ तैमें जखन सारिये नय त खुट कतअ आ खोइंछ कत पाबी । किछु दिन बाद त ई सिर्फ चर्चाक बिषय बैन क रैह जायत। मिथलानी सब जखन जुटती तखन चर्चा हैत इहो किछु छ्लय जे माँ आ सास एकर बारे में कहै छली ।भावना के अश्रु सिक्त आदान – प्रदान बस आब स्मृति में केवल नय रैह जाय तै एकरा अपन संस्कृति मानी के बचाबी ।

खोइंछ भरै के धार्मिक महत्व सेहो छै ।
दुर्गा पूजाक अवसर पर दुर्गा माँ के खोइंछ भरै के सेहो उत्साह देखै में आबैत छै । कहल जायत छै जे माँ के खोइंछ भरला सँ माँ प्रसन्न होयत छथीन । लोग के धन-धान्य , सुख- समृद्धि , ईश्वरीय अनुग्रह भरल पुरल रहैत आइछ । महाष्टमी के दिन माँ के सोलह श्रृंगार आ खोइंछ में भरै के लेल पान, सुपारी, फूल ,हल्दी, अक्षत, दूबि , मिठाई , बस्त्र आदि सँ खोइंछ भैर अपन मनक बात माँ के सामने राखैत छैन ।