“मिथिलामें बेटी-पुतौह के खोंइछ द’ विदा करबाक महत्व”

475

– रेखा झा।                     

“खोंईछ भरब”
खोंईछ शब्द के मतलब भेल साड़ी के आंचल,
मिथिलांचल मे अहि खोंईछ देनाई के बहुत शुभ परंपरा बनावल गेल, बेटी पुतहु सबके कोनो ठाम स प्रस्थान कयला स पहिने हुनक आंचर में चावल या धान या जीर , हरदि गांठ वाला, दूबि,सिंदूर आ द्रव्य (पाई) इ सबटा के एक संगे द क बान्हल जाइत अछि। खोंईछ लेलाक बाद ओ पुनः गंत्व्य स्थान पर पहुंच भगवती लग पूजा घर मे खोलल जैत।
अहि में जे पांच चीज अछि ओकर महत्व बहुत मानल गेल।
धन धान्य स पूरल रहै इ धान के महत्व, जीर सनक सुंगंधित रहू ई भेल जीर के महत्व, चावल मतलब अक्षत जेकर कखनो क्षय नहि होय, हरदि निरोगता के प्रतीक, दूबि के महत्व जे केहनो परिस्थिति मे चतरैत बढैत हरियरी बनल रहै, द्रव्य स परिपूर्ण रहू आ सिंदूर सबदिन चमकैत रहै, यैह कामना क विदा कैल जाईत अछि बेटी पुतहु के अहि लेल बहुत शुभता के प्रतीक मानल गेल खोंईछ देनाई।
पहिल बेर दुरागमन के खोंईछ में बहुत ठाम गुरपूरी सेहो अहि समान के संग देल जाईत अछि।
भगवती के आगमन भेला पर हम सब सेहो हुनका खोंईछ में अही पांच सामग्री के अलावा श्रृंगार प्रसाधन के सामान संगहि मधुर आ नारियल सेहो देल जाइत अछि,
भगवती स सबके यैह कामना करै छथि जे अहिना सब दिन सोहाग भाग बनल रहै आ सब अहि लेल हुनका सब चीज खोंईछ में समर्पित कैल जाइत अछि।
अपन सबहक मिथिलांचल मे इ बहुत नीक आ सौभाग्य सूचक संस्कृति में मानल जाइत रहल सबदिन।
आब त विवाह संगहि बेसीतर दुरागमन भ जा रहल मुदा पहिने तीन या एक वर्ष पर होईत छल आ संयोगवश कोनो कन्या गर्भावस्था मे रहैत छलीह त हुनक खोंईछ में, नारियल सेहो देल जाईत छल जाही स खोंईछ खोलिते देरी सासुर के लोक अहि बात के बुझि जाइत छलथि। पहिने फोन सब नहि रहै जे समाद तुरत पहुंच जैतइ।
ई संस्कृति अखन धरि बहुत नीक स सब घर मे बनल अछि आ महत्वपूर्ण स्थान बनेने अछि से बहुत सुंदर आ सुखद बात आ सदैव बनल रहत सबके घर में यैह कामना ।