“सृजनक आईना अछि परस्पर सहयोग”

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– अरुण कुमार मिश्रा                           

सहयोग मनुष्यक जन्मजात आवश्यकता अछि तँ एकर अस्तित्व, विकास आ जीवन सहयोगे पर निर्भर अछि। भोजन वस्त्र आ आवास मानवक मौलिक आवश्यकता अछि, अकर अतिरिक्त शिक्षा आ चिकित्सा सेहो ओतवे महत्त्वपूर्ण अछि।

मनुष्य अपन आवश्यकताक पुर्ति लेल अनेकानेक मनुष्य सँ सम्पर्क करैत अछि। अतवे नहि, मनुष्यक बहुत रास आवश्यकता एहनो अछि जकर पुर्ति अनकर सहयोग बिनु सम्भव नहि अछि। परिवार आ समाज मनुष्यक आवश्यकता पुर्ति लेल सहयोगात्मक एकजुटताक प्रतीक अछि।

एकाधिक मनुष्यक कुनु कार्य वा उद्देश्य पुर्तिक लेल सम्मलित प्रयास सहयोग कहल जाइत अछि। अर्थात सहयोग एक गोट प्रक्रिया अछि जकर मादे एकाधिक व्यक्ति वा समूह अपन प्रयत्न केँ संगठित रूप द’ सामान्य उद्देश्यक प्राप्तिक लेल काज करैत छैथ।

मनुष्य चेतन रुपमे सहयोगिक क्रिया करैत रहैत अछि अर्थात सहयोग चेतन अवस्थाक परिचायक थीक। संगठित आ सामूहिक प्रयत्नमे उद्देश्य समान भेने काज सुरआइत अछि। कारण एहिमे सभक सहभागिता होइत अछि, क्रिया एवं विचारक आदान-प्रदान होइत अछि। अन्तःक्रिया सकारात्मक होइत अछि, सहयोग करवाक प्रवृत्ति होइत अछि। सहयोग केनिहार अपन उत्तरदायित्वक निर्वहन मोन सँ करैत छैथ।

पूर्ण विकास सहयोगे सँ सम्भव अछि कयो सर्वज्ञ नहि अछि। कलाकारक सोझा डॉक्टर अयोग्य अछि, डॉक्टरक सोझा इंजीनियर, साहित्यकारक सोझा व्यापारी। कहवाक तात्पर्य ई जे सभ अपन-अपन विधामे पूर्ण छैथ मुदा संतुलित विकासक लेल एक दोसरक सहयोग अति आवश्यक अछि।

धरती पर जैविक संरचना एहि तरहक अछि कि समाज सँ परे असगर मनुष्यक विकास संभव नहि अछि। प्राणीमे शरीरक सभ अंगक कार्य केने मनुष्य अनेक तरहक कार्य करवामे सक्षम होइत अछि।

सृजनक आइना अछि परस्पर सहयोग। जाहि तरहेँ आमक वृक्ष केँ विशाल अस्तित्व, मधुर फल, शीतल छाया परस्पर सहयोगक परिणाम अछि। ओहिना मनुष्यक संपूर्ण व्यक्तित्व समाजक प्रयत्नक फल अछि। व्यक्ति आ समाजक कल्याण एहि पर निर्भर अछि कि लोक व्यक्तिवादक मानसिकता केँ छोड़ि केँ सहयोगक महत्व केँ समझते जीवनक अहम हिस्सा बनवैथ। सहयोगक भावनाक प्रारंभ “वसुधैव कुटुम्बकम्” सँ सजीव होइत अछि।

भारतीय सनातन संस्कृतिमे वर्ण व्यवस्थाक जड़िमे सहयोगात्मक प्रवत्ति छलैक। विशुद्ध कर्मक अनुरुपे समाजमे प्रत्येक वर्णक सहयोग भेटैत छलैक। गाममे उपनयन, विवाह आ श्राद्धकर्ममे समाजक सभ वर्ण वा वर्गक सहयोग देखवामे अबैत छलैक जे कमोबेश अखनो विद्दमान अछि। अखुनका अर्थयुगमे एहि परम्परामे ह्रास दिखना जाइत अछि।
अस्तु।

अरुण कुमार मिश्र
दिल्ली