“मिथिलाक पाबनि – चौरचन”

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आभा झा।                       

चौरचन पाबैन हम छोटे सँ अपन घर में होइत देखने छी। हर बर्ष खूब धूमधाम सँ चौरचन पाबैन होइत छल। घर में तीन-चारि दिन पहिने सँ खजूर,पिड़ुकिया सब पकवान बनैत छल। हमरा सबके बच्चा रही तऽ खाई पर ध्यान रहैत छल। हमर सासुर में तीज मनाओल जाइत अछि।
मिथिला में गणेश चतुर्थी के दिन चौरचन पाबैन मनाओल जाइत अछि। कतेक जगह पर चौठचंन्द्र नाम सँ सेहो जानल जाइत अछि। मिथिलाक संस्कृति में सदियों सँ प्रकृति संरक्षण आर ओकर मान-सम्मान के बढ़ावा देल जाइत रहल अछि। मिथिलाक अधिकांश पाबैन प्रकृति सँ जुड़ल अछि चाहे ओ छइठ पूजा में सूर्यक उपासना हो या चौरचन में चंद्रमाक पूजा के विधान।
भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी तिथि में साँझखन चौठचंन्द्र के पूजा होइत अछि। एहि में चंद्रमाक पूजा होइत छन्हि। अपना सभक मिथिला में मिथिलाक राजा “हेमांगद ठाकुर “सभ सँ पहिने एहि पाबैन के शुरूआत कयलाह जे एकटा पैघ ज्योतिषी सेहो छलाह। एहि पाबैन में नब मटकुरी,नब बाँसक डाली,पूरी,पकवान,अनोन तरकारी आदि सब वस्तु रहैत अछि।नब मटकुरी में दही,नब बाँसक डाली पर पूरी,पकवान लऽ कऽ साँझ में अंगना में अरिपन दऽ कऽ चंद्र भगवानक पूजा होइत छन्हि। ई पूजा दिन भरि व्रत कऽ साँझ में कियो कऽ सकैत अछि। पूजा भेलाक बाद सब नोन मिला कऽ नैवेद्य खा सकैत।
एहि पाबैन सँ जुड़ल एकटा कथा अछि जे एक बेर गणेश भगवान के देखि कऽ चंद्रमा हँसि देलखिन,एहि पर ओ चंद्रमा के श्राप देलखिन “आई सँ कियो तोहर मुँह नहिं देखय चाहत।”श्राप दऽ गणेश जी तऽ चलि गेलाह आ चंद्रमा मानसरोवर केर कुमुदिनी में जा कऽ नुका रहला। चंद्रमाक बिना सब प्राणी के बड्ड कष्ट होबय लागल। ई देखि ब्राह्माजी बहुत तरहें गणेश भगवानक अनुनय-विनय कयलाह। प्रसन्न मऽ गणेश जी वरदान देलखिन जे आब चंद्रमा श्राप सँ मुक्त भऽ जायत परंतु भादव शुक्ल चतुर्थी जे कियो देखत तकरा चोरी आ झूठक लांछन लागत। जौं फूल,फल,दही हाथें तोरा देखत तँ दोष नहिं लगतैक। फल,फूल के डालीक संग ई मंत्र पढ़ि चंद्रमा के देखला सँ कलंक दोषक निवारण होइत अछि। यथा—
” सिंह प्रसेन मवधीतः सिंहो जाम्वबताहताः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्योष स्यमन्तकः।।
एहि प्रकारे कृष्ण के भादव मासक चौठक चंद्र देखला सँ झूठक कलंक लागल रहनि। तैं कतौ-कतौ कलंक चौठ सेहो कहल जाइत छैक।
चौरचनक पूजा में भरि दिन व्रत कऽ साँझ में अंगना में पिठार सँ गोलाकार चंद्र मण्डल पर केराक पात दऽ ओहि पर पकवान,मधुर,ठकुआ,पिड़ुकिया,मालपुआ आदि राखल जाइत अछि। मुकुट सहित चंद्रमाक मुँहक अरिपन पर केराक पात दऽ रोहिणी सहित चतुर्थी चंद्रक पूजा उज्जर फूल सँ पश्चिम मुहें कैल जाइत अछि। परिवारक सदस्यक संख्या में पकवान युक्त डाली आ दहीक छाँछी के अरिपन पर रखबाक चाही। केराक घौर,दीप युक्त कुड़वार (माटिक कलश),लावन आदि के अरिपन पर राखी। एक-एक डाली,दही,केराक घौर उठा कऽ सिंह प्रसेन मंत्रक संग दधिशंखतुषाराभम्—मंत्र पढ़ि कऽ समर्पित करी। प्रत्येक व्यक्ति हाथ में एक-एक फल लऽ ओहि मंत्र सँ चंद्रमाक दर्शन कऽ प्रणाम करैत रही।एहि में ब्राह्मण भोजनक सेहो बहुत महत्व अछि। घरक बुजुर्ग स्त्रीगण सब हाथ उठबैत काल ई गीत गाबैत छथि,’पूजा के करबै ओरियान गै बहिना,चौरचन के चंदा सोहाओन ‘,ई दृश्य अत्यंत मनोरम होइत अछि।

आभा झा
गाजियाबाद