एहि दुइ पाप सँ स्वयं केँ बचाउ

151

स्वाध्याय-विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

आजुक प्रसाद

 
आइ जुलाई १ तारीख, तदनुसार वृहस्पति दिन – ईस्वी संवत् २०२१ !! काल्हि एकटा बड महत्वपूर्ण श्लोक सोझाँ आयल छल जाहि मे कहल गेल छलैक कि दस टा बेटा के पोसनाय बराबर एकटा बेटी के पोसब होइत छैक। ताहि बेटी केँ हमर-अहाँक सामाजिक दस्तूर मुताबिक कन्यादान करैत ओकर पति परिवार केँ सौंपि देबाक परम्परा छैक। जखन बेटीक विदाई होइत रहैत छैक ताहि समय बेटी आ बेटीक नैहर (माय, पिता, भाइ, व समस्त परिजन) केर मोन मे अजीब भाव (तरंग) अबैत रहैत छैक। “आइ सँ हमर करेजक टुकड़ा पराया भऽ गेल” – एतय पराया केर अर्थ आध्यात्मिक अर्थ मे मात्र बुझल जाइत अछि, आब माता-पिता सँ बेसी पति-परिवार संग अपन अलग संसार निर्माण करत धिया से भाव होइत छैक। आर विडंबना देखू – सृष्टि सृजनक एतेक पैघ नियम केँ अनुसरण करबाक लेल वर्तमान मिथिला समाज बुनैत-बुनैत एहेन जाल बुनि लेलक जे सब किछु बुझितो स्वयं फँसैत अछि, तड़पैत अछि आ कतेको त एकटा बेटीक विदाई करैत साकिमो भऽ जाइत अछि। आर ई सब देखि लोक मायक कोखि आ भ्रूण जाँच करबैत एतेक महत्वपूर्ण मातृशक्ति केँ जन्म सँ पूर्वहि सफाया करबाबैत अछि। आह!! हे जगज्जननी!! ई मानवलोक पर आफद कियैक नहि आओत!! जे मानव प्रकृति के सिद्धान्त विरूद्ध खेलबाड़ करत ओकरा ऊपर बज्रपात कियैक नहि होयत!! आइ जे मानव समाज तरह-तरह सँ दण्डित कयल जा रहल अछि प्रकृति द्वारा से देखि कोनो विस्मय नहि करबाक चाही।
 
आइ नजरि मे एकटा बड पैघ ज्ञानक प्रकाश भेटल श्रीअर्जुन-श्रीकृष्ण वार्तालाप मे, से तखन जखन मुक्तिप्रसंग पढि रहल छलहुँ। मनुष्य लेल मुक्ति (मोक्ष) सर्वोपरि उपलब्धि होइत छैक। लेकिन मूढ़तापूर्वक कतेको लोक स्वयं केँ मुक्त बुझैत आ संत-महापुरुष देखबितो आखिरकार एहेन जघन्य अपराध कय बैसैत अछि जेकर भान ओकरा अपनो शायद नहि रहि पबैत छैक। ऊपर जेना बेटीक भ्रूण हत्याक बात आयल अछि ताहि सँ फर्क एकटा आर जघन्य अपराध ई छैक जे लोक स्त्रीक इज्जत सँ खेलबाड़ करैत अछि। ई बुझैत जे एहि सृष्टिक मर्यादा यैह बेटी-बधू सँ चलैछ, तखनहुँ दुराचारी पुरुषत्वक शिकार वैह मातृशक्ति केँ बनबैत अछि ई मानव-समाज। अर्जुनक ई प्रश्न आ श्रीकृष्णक ई उत्तर आइ प्रसादक रूप मे अपने सब धरि अनलहुँ अछि –
 
जखन अर्जुन प्रश्न कयलथि –
 
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥गीता ३ – ३६॥
 
“हे कृष्ण! तखन फेर ई मनुष्य स्वयं नहियो चाहैत बलात्कार सँ लगायल जेबाक भाँति केकरा सँ प्रेरित भऽ कय पापक आचरण करैत अछि?”
 
ताहि पर भगवान् श्रीकृष्ण केर जवाब आयल –
 
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्॥गीता ३ – ३७॥
 
“रजोगुण सँ उत्पन्न भेल कामहि क्रोध छी, ई बहुत खायवला अर्थात् भोग सँ कहियो नहि अघायवला आर बड़ा पापी अछि, एकरहि अहाँ एहि विषय मे वैरी जानू।”
 
एतय भगवान् पाप होइ मे रजोगुण सँ उत्पन्न काम (lust) केँ कारण बतेलथि तथा कामहि सँ उत्पन्न क्रोध आदिक उत्पत्ति बतेलथि, काम केर नाश सँ एहि सभक नाश होइत अछि, मुदा काम-क्रोध आदिक होय मे प्रारब्ध (पूर्व संचित कर्म) कारण नहि थिक, कियैक तऽ भगवान् काम केर कारण आसक्ति केँ बतेलनि अछि – “सङ्गात् संजायते कामः – गीता २-६२”। आर आसक्ति कियैक होइत अछि तेकरो बहुत रास सूत्र-समीक्षा बड़ा विस्तार सँ गीता मे अर्जुनक जिज्ञासा अनुरूप कुल ७०० श्लोक मे वर्णन कयल गेल अछि।
 
एतय हम अधिक विस्तार नहि करब, केवल प्रसाद देबाक छल आजुक। हम मनुष्य बनिकय आयल छी। हमर कर्म पर हमरहि टा अधिकार अछि। लेकिन जेना ऊपर भगवान् कहलथि ‘सङ्गात् संजायते कामः’ – संगहि सँ सारा गुण आ दोष केर आरम्भ बुझू। ई हमरा-अहाँक अपन विचार आ संगत पर अछि। जँ हम अपन इन्द्रिय केँ ओकरा सभक विषय मे बहकय लेल जाय देबैक त स्वाभाविक छैक जे काम-क्रोध-लोभ-मोह-मत्सर-ईर्खा सारा षट्दोष हमरा-अहाँ मे आओत आ हम-अहाँ नरकगामी बनब। जँ ताहि सँ बचय चाहैत छी त निवृत्ति मार्ग पर चलू, अपन ईच्छा केँ शमन करू। एक्के बेर नहि होयत, धीरे-धीरे होयत। अभ्यास सँ होयत। एकटा शपथ तऽ एखन तुरन्त खा लियऽ – नहि दहेज लेबय, नहि दहेज देबय – बेटी-बेटा केँ समान शिक्षा दय असल मनुक्ख बनेबय।
 
हरिः हरः!!