हिन्दू रेबाज मे कुल ८ तरहक विवाह

लेख

– पराग शर्मा (अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)

हिन्दू रेबाज मे कुल ८ तरहक विवाह

मनुस्मृति मे विवाहक ८ प्रकार कहल गेल अछि। जाहि मे तीन तरहक विवाह केँ खराब मानल जाइछ। असुर, राक्षस एवं पैशाच – विवाहक ई तीन प्रकार केँ मनुस्मृति मे नीक नहि कहल गेल अछि। आउ, देखी आर कोन-कोन तरहक विवाह आ केना-केना होइत अछि।
 
१. असुर विवाह कि थिक?
 
असुर विवाह मे कन्याक परिजन केँ मूल्य दय केँ कन्या कीनल जाइत छैक। कन्याक सहमति बिना विवाह करा देल जाइत छैक। एहि तरह सँ कयल गेल विवाह केँ असुर विवाह कहल जाइत अछि।
 
२. राक्षस विवाह केकरा कहल गेल अछि?
 
कन्या केँ बहला-फुसला या फेर अपहरण कय केँ जबरदस्ती विवाह करब राक्षस विवाह कहाइत अछि। पुराण मे कन्याक अपहरण कय केँ विवाह करेबाक कतेको कथा-गाथा भेटैत अछि। हलांकि एकरा नीक नहि मानल गेल अछि। भीष्म द्वारा काशीक राजकुमारी लोकनि केँ एहि रीति सँ हस्तिनापुर केर राजकुमार सँ विवाह करायल गेल छल।
 
३. पैशाच विवाह केहेन होइत छैक?
 
जबरदस्ती या बेहोशीक हालात मे कन्या सँ संबंध बनाकय ओकरा सँ विवाह करब पैशाच विवाह कहाइत अछि। मनुस्मृति मे एहि विवाह केँ सब सँ खराब रीति कहल गेल अछि।
 
४. ब्रह्म विवाहः विवाहक सब सँ नीक रीति!
 
मनुस्मृति मे ब्रह्म विवाह केँ सब सँ नीक कहल गेल अछि। एहि मे दूल्हा आ दुल्हन समेत दुनूक परिजन लोकनिक सहमति भेलाक बाद कन्या दान कय केँ विवाह संपन्न करा देल जाइछ। एहि विवाह मे सब प्रकारक वैदिक रीति-रिवाज आ नियमादिक पालन कयल जाइत अछि।
 
५. देव विवाह
 
ब्रह्म विवाह सँ मिलैत-जुलैत देव-विवाह होइछ। एहि मे कोनो ज्ञानी आ संस्कारी व्यक्तिक संग कन्याक सहमति सँ वैदिक रीति सँ विवाह संपन्न कयल जाइछ।
 
६. आर्श विवाह
 
आर्श विवाह बेसीतर आदिवासी समुदाय मे कयल जाइछ। एतय वर पक्ष केर लोक कन्याक पिता केँ विवाह करबाक लेल गाय दान करैत अछि। पिता वर केर संग अपन कन्याक विवाह करा दैत अछि। एहि विवाह केँ आर्श विवाह कहल जाइछ लेकिन आब गाय केर जगह मूल्य देनाय प्रचलित अछि।
 
७. प्रजापत्य विवाह
 
एहि मे माय-बाप कन्याक सहमति नहि लैछ। माय-बाप अपन संतान लेल जीवनसंगिनीक चुनाव करैत अछि। परिवारहि केर इच्छानुसार वर-वधू केँ विवाह करक रहैत छैक।
८. गन्धर्व विवाह
गन्धर्व विवाह मे वर आ कन्या अपन परिवारक सहमति बिना आर नहिये कोनो धार्मिक रीति-रेबाजक पालन करैत विवाह कय लैत अछि। आधुनिक युग मे एकरे ‘प्रेम विवाह’ केर संज्ञा देल गेल छैक।
 
साभारः पराग शर्माक लेख नवभारत टाइम्स मे प्रकाशित (अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
हरिः हरः!!