झूलन आ हम मिथिलावासी, भाव भजन सम्पन्न रहल अछि हमरा लोकनिक इतिहास

झूलन उत्सव २०१८ सम्पन्न
 
हरेक वर्ष सावन मासक आखिर ५ दिन भक्तजन जाहि सुन्दरतम् भाव सँ भगवान् केँ झूला मे झूलबैत छथि – काल्हि सावन पूर्णिमाक दिन आखिरी झूला झुलाकय झूलन महोत्सव ठाम-ठाम मे सम्पन्न भेल। झूला झुलेबाक बहुत रास भाव हमरा लोकनिक मिथिला मे प्रचलित अछि।
 
झूला झुले सुकुमारि – झूला झुले सुकुमारि
आ रे बदरिया, आ रे बदरिया, आ रे आ!!
 
एहिठाम जनकन्दिनी किशोरीजी जे पराम्बा जगज्जननी थिकीह, जे एहि धरतीक ‘मिथिलाक्षेत्र’ केर सिद्धि केँ चरितार्थ करबाक लेल स्वयं धरतीये सँ प्रकट भेलीह अछि, खेत मे जोतल जायवला ‘हर’ केर ‘अग्रभाग’ जेकरा ‘सीत’ कहल जाएछ ताहि सँ प्रकट देवी ‘कुमारि’ रूप मे प्रकट होयबाक कारण ‘सीता’ कहेली। आर, ई सौभाग्य हम समस्त मिथिलावासी संग-संग सौंसे ब्रह्माण्डक प्रत्येक जीव-जन्तु, दृश्य-अदृश्य समस्त शक्ति आ अस्तित्व लेल भेल जे जगद्धात्री परम-कृपालू अम्बिका किछु विशेष प्रयोजन सँ पृथ्वी पर आबि गेलीह।
 
अपना किशोरीजी के टहल बजेबय
यौ हम मिथिले मे रहबय!
हमरा नञ चाही चारूधाम….
हम मिथिले मे रहबय!!
साग-पात खोंटी हम दिवस गमेबय
यौ हम मिथिले मे रहबय
हमरा नञ चाही धन ओ मान…
हम मिथिले मे रहबय!!
 
भाव देखू! कवि सौंसे पृथ्वी पर कतहु अन्यत्र जाय लेल राजी नहि छथि। ओ वैह धरती मे रहबाक लेल अपन सारा लिप्सा, ममता, माया, मास्चर्ज सब किछु परित्याग करय लेल राजी छथि, धरि ओ मिथिला जाहि ठामक पवित्र भूमि सँ स्वयं जानकी प्रकट भेलीह – जिनका दुलार सँ कतेको नाम देल गेल अछि – किशोरीजी सेहो हुनकहि कहल गेल छन्हि, त कवि मात्र एहि धराधाम मे रहिकय किशोरीजीक टहल (सेवा) बजाबय चाहि रहला अछि। हुनका चारूधाम केर यात्रा नहि करबाक छन्हि, हुनका दिन गुजारय लेल धन-मान आदिक कोनो आवश्यकता नहि छन्हि… ओ जेना-तेना एहि धराधाम ‘मिथिलाधाम’ मे रहि अपन गुजर चला लेता, लेकिन किशोरीजीक सेवा करैत अपन जीवन बितेता से संकल्प गाबि-गाबिकय प्रकट कय रहला अछि। ई थिक अपन मिथिलाक विशुद्ध भक्तिभाव, ई थिक स्त्रीत्व प्रति असीम समर्पण।
 
कवि मधुपजी त महादेव केँ खुलेआम सब उल्हन-उपराग तक दय देलखिन, लेकिन कनेक अलग अन्दाज मेः
 
तोर घरक लखि हाल महादेव
विस्मित अछि संसार
के ई उठा सकय अछि भार!
 
खेती न पथारी न घर घरारी
पेटू भरि परिवार
के ई उठा सकय अछि भार!
 
तिख-बिख भोजन सदा मसानी
भूत-परेत समाज निसानी
 
नंग-धरंग भंग टा छानी
सह-सह साँप निवासहि जानी
 
मुण्डमाल विधुभाल जटासँ
बहय छै गंगाधार
के ई उठा सकय अछि भार!
 
‘मधुप’ जेठसुत षड्मुखधारी
तापर गजानन पेटक भारी
 
पंचानन अपनहि त्रिपुरारी
भैरव भेला भांग भरारी
 
अन्नपूर्णा बिना देतनि के
अजगर सभक अहार
के ई उठा सकय अछि भार!
 
स्पष्टे छैक। ‘अजगर’ सभक आहार बिना अन्नपूर्णाक कृपा सँ नहि भेटत। ‘गौरीदाय’ केँ सेहो मिथिलावासी अपनहि बेटी होयबाक भाव रखैत आयल अछि। आब भले मिथिलावासी हिन्दी आ अंग्रेजीक अफीम मे डुबकी लगबैत हो आ मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी वला कहाबत सँ बेसी कबिलतय मे रणे-वने छिछियाइत हो – तैयो टिरबी आ टिटकारी त उँचे रखैत अछि – कारण दिल्लीक मंगोलपूरी हो आ कि मुम्बई के विरार, मिथिलावासी आइयो अपन संस्कार केँ जीबित रखबाक अथक प्रयास करिते अछि। पुरुखाक सिखायल मार्ग सँ ओ आइयो हँटय लेल मोन केँ नहि मना पबैत अछि। तखन त ढेर होसियार केर हजार भतार! जे अपने इच्छे अपन घरहु मे भाषा बिसरल तेकर बाल-बच्चा अपन संस्कृति मे केकरो रहि गेल हो आ कि ओहेन लोकक डीह पर कहियो कतहु चुहचुही तक नजरि आबि जाय त कनी हमरा लिखिकय पठा देब, कथा छापब मैथिली जिन्दाबाद पर।
 
हँ, कहि रहल छलहुँ जे शिव केँ सेहो मिथिलाक जमाय मानल जाइत छन्हि। एक हजार गारि-फझेत ‘नारद बाभन’ केँ मिथिलाक कवि आ गीतकार तथा भजनानन्दी लोकनि दैत रहैत छथिन आइयो। ‘मैना’ यानि गौरीक माय आ हिमवान् राजाक सखा-स्वजन, समाज, पड़ोसी समस्त मिथिलावासीक भाव रहैत छन्हिः
 
हम नै बियाहब शिव भंगिया भिखारी
धिया कोना रहती
भूत-प्रेतबा के संग
धिया कोना रहती!
 
चलू, पहिलुका युग मे त कतेको दूलहा केँ घर सँ चुमाओन करिते कोनो गुप्त रहस्य उजागर भेला पर सखी-बहिनपा लौटा देलखिन ई बात त सुननहिये होयब। गौरीक माय मैना सेहो अटपटान त देलखिन, मुदा गौरीक अनुरोध पर शिवजी जखन अपन ‘अलौकिक रूप’ सब केँ दर्शन करा देलखिन तेकर बाद त बुझिते छियैक जे हमरा सन-सन लिखनिहार लेल आइयो वैह परमाधिपति देवाधिदेव महादेव केर चरित्र सम्बल बनैत अछि जे लिखय बैसि जाइत छी। कहबाक तात्पर्य हमर एतबा अछि जे भाव सँ भगवानक भजन जेहेन हम मिथिलावासी करैत छी, जाहि तरहें राम, कृष्ण, शिव सहित समस्त शक्तिरूपा आराध्या केँ भजन-सुमिरन हमरा लोकनि करैत छी तेकर जोड़ा संसार मे कतहु आन ठाम नहि भेटैत अछि। तखन न भगवानो सँ खेती करय लेल कहय लगैत छियन्हि… सुनू-सुनूः
 
गे माई नित उठि गौरी
शिव केँ मनाबथि
करू बिगहा दुइ खेत
त्रिशूल तोड़ि शिव फार बनाओल
भंगघोटना के हरीश
जटा तोड़ि हर लदहा बनौलनि
हर केलनि समतूल….
 
तखनहुँ जँ अभगदशा ‘प्रवीण’ पर आबय आ ओ अपन भाषा, अपन वेश, अपन गाम, अपन संस्कार आ अपन पुरुखा केँ बिसरय तऽ ओकरा सँ पैघ अभागल दोसर के?
 
खैर! आइ बहुत दिनक बाद भगवान् केर झूला पर किछु लिखबाक लेल बैसल छी। सीता संग राम केँ झुलेलहुँ। वृन्दावन मे मात्र रासलीला नहि होइछ, ओतहि टा लोक राधा संग कृष्ण केँ नहि झुलबैत छथि। हम सब सेहो वृन्दावन आ रास अपन गामक मन्दिर-मन्दिर मे दर्शन कय पबैत छी।
 
झूला लगे कदम की डारी
झूले कृष्ण मुरारी ना
 
कोन रूप के बनल हिरोला
कोन रूप के डोरी
सोन रूप के बने हिरोला
रेशम लागे डोरी
झूला लगे कदम की डारी
झूले कृष्ण मुरारी ना
 
कौन झूले कौन झूलावे
फेराफेरी ना…
हे सखिया फेराफेरी ना
राधा झूले कृष्ण झूलावे
कृष्ण झूले राधा झूलावे
फेरा-फेरी ना…
हे सखिया फेराफेरी ना
झूला लगे कदम की डारी
झूले कृष्ण मुरारी ना….
 
चहूँ ओर से घिरे बदरवा
कारी-कारी ना
हे सखिया कारी-कारी ना…
जमुना किनारे कृष्ण बजाबे
मधुर मुरलिया ना
झूला लगे कदम के डारी
झूले कृष्ण मुरारी ना
 
चलू, तखन आब झूला त ऐगले वर्ष मे आओत, मुदा ई लेख अपने सब लेल मैथिली जिन्दाबाद पर राखि रहल छी जे कहियो पढब तऽ एक बेर अपन सुन्दर उपवन – हरियर वन ‘मिथिलाधाम’ केर खूब याद जरूर आओत। इच्छा नहियो होइत होयत गाम एबाक तैयो दशहरा मे गाम जरूर आयब, ई हमरा विश्वास अछि। गाम आयब त टूटल चार (घर) केँ सेहो नवका खर्ह सँ छड़बा लेब। घरक भगवती (कुलदेवी-कुलदेवता) केँ जल-फूल केर इन्तजाम कय केँ जायब। घर मे बुढ-पुरान केँ छोड़ने होयब तऽ हुनका सब बातक नीक इन्तजाम कय देबनि, भोजन, दबाइ, सेवा आ स्वच्छ वातावरण – ई सबटा चाही।
 
आखिरी मे ईहो कहय चाहब जे स्वयं नारायणक एक अवतार मे बालरूप राम व हुनक अंशावतार आरो तिनू भाइ केँ हुनक माय यानि महाराजा दशरथक महारानी लोकनि जे झूला झुलबैत छलखिन ताहि पर ‘गीतावली’ मे महाकवि तुलसीदास बड़ा रोचक वर्णन कएने छथि, से मनन करूः
 
झूलत राम पालने सोहैं
 
झूलत राम पालने सोहैं । भूरि-भाग जननी जन जोहैं॥
तन मृदु मंजुल मेचकताई । झलकति बाल बिभूषन झाँई॥
अधर-पानि-पद लोहित लोने । सर-सिंगार भव-सारस सोने॥
किलकत निरखि बिलोल खेलौना । मनहुँ बिनोद लरत छबि छौना॥
रंजित-अंजन कंज-बिलोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥
लस मसिबिंदु बदन-बिधु नीको । चितवत चितचकोर तुलसीको॥
 
श्रीरामलला पालना मे झूला झुलैत शोभा पाबि रहल छथि आर बड़भागिनी माय लोकनि हुनका दिश निहारी रहली अछि। भगवान् केर शरीर मे अति मृदुल आर मंजुल श्यामता सुशोभित अछि, जाहिपर बालोचित आभूषणक झाँइ झलैक रहल य। प्रभुजीक अति सुन्दर अरुणवर्ण ठोर, हाथ आर पैर एहेन लगैत अछि मानू श्रृंगारसरोवर मे उत्पन्न कोनो सोनाक कमल हो। खेलौना सभ हिलैत देखिकय ओ किलकारी मारैत छथि, मानू छबिक छो़ट-छोट बच्चा सब खेल-खेल मे लड़ि रहल हो। हुनक कमलवत नेत्र मे अंजन (काजरक सुरमा) आँजल (लागल) अछि। माथपर गोरोचनक तिलक सुशोभित अछि। मनोहर मुखचन्द्रपर अति सुन्दर काजरक ठोप लागल अछि। ओहि मुखमयंक केँ तुलसीक चित्तरूप चकोर निहारि रहल अछि।
 
पुनः दर्शनाय!
 
हरिः हरः!!